सादर प्रणाम श्री नरेंद्र मोदी जी|

आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी,

इस महान देश के साधारण नागरिक की ओर से आपको कोटि-कोटि प्रणाम!
अपने परिचय में मैं बस इतना कहूँगा कि मैं एक मेकॅनिकल इंजिनियर हूँ और पिछले ४ वर्षों से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कार्यरत हूँ| इंजिनियरिंग की पढ़ाई मैने अबीट्स पिलानी के गोआ कॅंपस से संपूर्ण की और उसके ठीक बाद ही नौकरी में लग गया| मेरी उम्र २७ वर्ष है और मेरे परिवार में माँ, पिताजी, भैया एवं भाभी हैं| मैं मध्य प्रदेश में जबलपुर नामक शहर से हूँ और फिलहाल मुंबई में रह रहा हूँ|
देश के लिए आपने अब तक जितना कुछ कर दिखाया है एवं आगे भी करते जा रहे हैं उसको देखकर आपने मेरी सोच में बेहद परिवर्तन कर दिया है| आज से ठीक २ साल पहले मैं इस देश से बाहर जाकर अपनी मास्टर्स की पढ़ाई करना चाहता था और अमेरिका या फ्रांस जैसे किसी देश में बस जाना चाहता था| अब इसे मुक़द्दर कहूँ या फिर बदक़िस्मती यह नहीं समझ आता, क्योंकि मैने ४ यूनिवर्सिटीस में अप्लिकेशन भेजी लेकिन एक में भी मेरे दाख़िला न हो सका| किसी ने कहा की मेरी पढ़ाई के नंबर कम हैं तो किसी ने कहा कि बाकी क लोगों की प्रोफाइल ज़्यादा मज़बूत है| इस कारण से मैं यहाँ रह गया|अब मुझे ऐसा लगता है अच्छा हुआ कि मैं बाहर नही गया| देश में जिस गति से विकास और अच्छे बदलाव लगातार हो रहे हैं मैं उसका अहम हिस्सा बनना चाहता हूँ और अपनी हर संभव कोशिश से इसको और अच्छा करना चाहता हूँ| आप या आपके प्रार्थी इसको ऐसे भी देख सकते हैं कि दूसरे देश में न जाने क कारण मैं अपनी परिस्थिति से समझौता कर रहा हूँ शायद| मैं इस बात को नकार नहीं सकता क्योंकि इस वक़्त मैं खुद भी नहीं जानता की यह कितना सच या झूट है|
मैं बस इतना जानता हूँ की देश के लिए अब तक कुछ न कर सकने के कारण मैं हर रात सोने से पहले बहुत खोखला महसूस करता हूँ| ख़ुद की उन्नति (चाहे जितना भी कम या ज़्यादा अब तक हासिल कर सका हूँ) से कभी खुशी नहीं मिली क्योंकि अगले ही पल मुझे कोई ऐसा दिख जाता है जो मुझसे बुरी स्थिति में जी रहा है और मैं उनकी कोई मदद नहीं कर रहा हूँ| सिर्फ़ अपनी स्वार्थ ज़िंदगी बिताए जा रहा हूँ, बिना किसी लक्ष्य या मक़सद के|
देश का कॉर्पोरेट वर्ल्ड का एक छोटा सा हिस्‍सा देखने के बाद मुझे बार-बार ऐसा महसूस होता है जैसे मेरी जगह काँच की बिल्डिंग में बने हुए एसी कमरे में नहीं बल्कि बाहर है जहाँ मैं अपने हाथों से लोगों का जीवन बेहतर बनाने हेतु डटा रहूं|
मेरी तीव्र इच्छा है की शिक्षा के क्षेत्र में कुछ अच्छा करूँ और उसको बढ़ता रहूं| इस विषय में मैने एक ऐसे विद्यालय या विश्वविद्यालय का सोचा है जो अपने आस-पास के इलाक़े में पाए जाने वाले साधनों का उपयोग कुछ इस तरह करना सिखायें कि वहाँ के सभी लोगों को एक बराबर लाभ हो और साथ ही साथ वातावरण को भी लाभ पहुँचे| उदाहरण के तौर पर, यदि किसी गाँव में पानी की कमी है और सूखी मिट्टी की मात्रा अधिक है तो हम वहाँ का बच्चों और बड़ों को पानी बचाते हुए उस मिट्टी का सबसे अच्छा उपयोग करना सिखाएँगे| साथ ही साथ बच्चों को पढ़ाई से जुड़ा हुआ भौतिक विज्ञान, गणित और उनकी पसंद के कुछ विषय भी पढ़ाएँगे जो की उनको आगे बढ़ने में समर्थ बना सकता है| उस पढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा उस गाँव की सभ्यता, संस्कृति और उससे जुड़े हुए लाभ क बारे में भी बताएगा|
इस सोच की बुनियाद यह है कि किसी भी गाँव से निकलने की चाहत लोगों में न आए और वे सभी अपने परिजनों के साथ रहकर रोज़गार और विकास का तरीका निकालें| यदि कोई निकलना भी चाहता है तो कम से कम इतने लोग उस जगह ऐसे रह जाएं जो उसकी देख-रेख और विकास की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं| अपनी जड़ों और नैतिक मूल्यों से दूर होकर मुझे कोई ख़ास उन्नति नहीं मिल सकी है| आज शहरों में सभी को इधर से उधर भागते हुए देखता हूँ| किसको धक्का मार रहे हैं और किसका नुक़सान करते हुए बढ़े जा रहे हैं इसका किसी को ध्यान नहीं| पैसे कमाने निकल पड़े हैं लेकिन इंसानियत से दूर जात हुई राह पर कहाँ रुकना है इसका कोई इल्म नहीं दिखता मुझे अपने जीवन में| क्यों कर रहा हूँ ऐसा यह समझ नही आता| लेकिन इस तरह के जीवन-व्यापन से मुझे वह खुशी नहीं मिलती जो की किसी बेसहारा की मदद करने या फिर किसी वंचित इंसान की उन्नति क बारे में पढ़कर मिलती है और पिछले कुछ वर्षों से मेरी सूची में आपका नाम सबसे उपर है| आपकी तरह सब कुछ त्यागकर देश की सेवा करने की क्षमता शायद नहीं है मेरे अंदर| हाँ लेकिन इतना जज़्बा ज़रूर रखता हूँ की ज़रूरत पड़ने पर किसी के भी लिए चट्टान हिला दूं|
आप यह सोच रहे होंगे कि यदि मैं इतनी बड़ी-बड़ी बातें करता हूँ तो फिर अब तक कलेक्टर या फ़िर अन्य कोई ऐसी जगह क्यों न चला गया जहाँ बदलाव लाने हेतु सरकार मुझे ज़िम्मेदारी दे सकेगी| इसका कारण यह है की आपके प्रधान मंत्री बनने से पहले मेरा देश के प्रति कोई रुझान न था| आपके प्रधान मंत्री बनने के बाद कि हमारा देश ईमानदार मेहनत से कितना महान बन सकता है तब तक मेरी उम्र थोड़ी बढ़ चुकी थी| इसका एक कारण यह भी है कि ईमानदारी से मेहनत करना और अनुशासन में रहना मैने अभी-अभी हे सीखा है| इसके पहले तक आलस्य से मेरी घनिष्ट मित्रता थी|
अंत में आपसे यह विनती करता हूँ की यदि इस दिशा में आपका कोई भी विचार, कार्य अथवा योजना, अभी या भविष्य में हो, तो मुझे भी उसमे शामिल कर लें या फ़िर एक रास्ता दिखा दें जिस पर मैं अग्रसर हो सकूँ|
आपका कीमती समय देने क लिए मैं हमेशा आपका आभारी रहूँगा|
भगवान आपको हमेशा स्वस्थ रखे और देश को आगे ले जाने की नई दिशायें दिखता रहे|
सादर प्रणाम|

आपका भवदीय,
अक्षत तिवारी
९९०७५४१८३५ / ७५०६९१४२४०
akshatsimba@gmail.com

No comments:

Post a Comment